रेप जैसी दुर्घटना पर लिखना हो रहा मुश्किल है,
खुद मैं भी एक औरत हूँ, इस दर्द को सहना मुश्किल है,
अन्धेरे की बात नहीं, अब दिन में निकलना मुश्किल है,
पढ़ लिख कर अब करें भी क्या ?
जब घर से निकलना मुश्किल है,
अब नारी के हक की लड़ाई क्या?
स्वाभिमान बचाना मुश्किल है,
नारी का विकास ही, क्या ?
खुद नारी का बचना मुश्किल है,
प्रसासन से सिर्फ प्रश्न यही क्या
हत्यारों को फांसी पर लटकाना मुश्किल है……?